अरशद वारसी के पेरेंटिंग टिप्स: ‘उम्र ज्यादा नहीं तो अनुभव जरूरी नहीं’

बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता अरशद वारसी ने हाल ही में अपने पेरेंटिंग अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि बच्चों की परवरिश के लिए कोई निर्धारित नियम नहीं होता। उनका मानना है कि उम्र ज्यादा होने का मतलब हमेशा अधिक अनुभव होना नहीं है। उन्होंने पेरेंट्स को बच्चों के साथ धैर्यपूर्वक व्यवहार करने और उनकी सोच को समझने की सलाह दी।
उम्र और अनुभव का फर्क
अरशद वारसी ने स्पष्ट किया कि उम्र के साथ अनुभव जरूरी नहीं आता। उनका कहना है कि अक्सर लोग सोचते हैं कि 50 साल का इंसान ज्यादा समझदार होगा, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं। 50 साल का वह व्यक्ति जो कुछ नहीं करता, वह कम उम्र के व्यक्ति से कहीं ज्यादा ज्ञान नहीं रखता। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि असली समझदारी उम्र से नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों से आती है।
वहीं, पेरेंटिंग में भी यही बात लागू होती है। सिर्फ इसलिए कि माता-पिता उम्र में बड़े हैं, उन्हें ज्यादा समझदार नहीं माना जाना चाहिए। बच्चों को अपनी राय रखने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए ताकि वे खुलकर अपनी परेशानियाँ और विचार साझा कर सकें।
हर बच्चे की अपनी पर्सनैलिटी
अरशद ने कहा कि हर बच्चा अलग होता है और इसकी परवरिश का कोई तय तरीका नहीं हो सकता। बच्चों की जरूरतों और व्यक्तित्व को समझकर ही उन्हें सही दिशा दी जानी चाहिए। माता-पिता को समझना चाहिए कि बच्चे भी उन्हें सिखाते हैं कि पेरेंट्स कैसे बनें।
उन्होंने बताया कि बच्चों से प्यार तब तक होता है जब तक वे माता-पिता की हर बात मानते हैं, लेकिन जैसे-जैसे बच्चे बड़ी सोच रखने लगते हैं, पेरेंट्स नाराज हो जाते हैं। जबकि असल में, उस समय बच्चे अपनी स्वतंत्र सोच व्यक्त कर रहे होते हैं। पेरेंट्स को समझना पड़ेगा कि उनकी हर बात सही नहीं होती और बच्चों की सही सोच को भी सम्मान मिलना चाहिए।
अरशद ने यह भी कहा कि पेरेंटिंग में बस एक किताब की बात या एक फिक्स्ड नियम को फॉलो करना उचित नहीं है। बच्चों के साथ व्यवहार करते समय उनकी खुद की पसंद, व्यवहार और जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी है।
यह समझना आवश्यक है कि माता-पिता को अपनी पावर दिखाने की बजाय बच्चों की भावनाओं को समझना चाहिए। बच्चों की गलतियों को सुधारते समय पेरेंट्स को धैर्य और खुला मन रखना चाहिए, ताकि रिश्ते मजबूत बने रहें।
अरशद वारसी के अनुभव से साफ होता है कि बच्चों को पालना केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि प्रेम, समझ और सहिष्णुता की भी जरूरत होती है। वह कहते हैं कि बच्चे आपको माता-पिता बनने का तरीका भी सिखाते हैं।
अंततः, बच्चों की सोच और अनुभव को तवज्जो देना जरूरी है ताकि एक स्वस्थ और समझदार रिश्ता विकसित हो सके। पेरेंटिंग में उम्र जरूरी नहीं होती, असली मायने हैं अनुभव और समझ के।



