धर्म

शारदीय नवरात्रि 2026: डिजिटल उपवास के साथ स्क्रीन से भी दूर रहें!

दिल्ली के 25 वर्षीय शुभम की रोजाना की दिनचर्या सोशल मीडिया पर रील्स स्क्रॉल करना थी। सोने से पहले भी उनका फोन हाथ में रहता था। इससे उन्हें सिरदर्द, चिड़चिड़ापन और पढ़ाई में मन न लगने की समस्या होने लगी। इस नवरात्रि शुभम ने न केवल अन्न का व्रत रखा बल्कि डिजिटल व्रत का भी संकल्प लिया। उन्होंने फोन का स्क्रीन टाइम प्रतिदिन एक घंटे पर सीमित किया और रात को सोने से दो घंटे पहले फोन दूर रखना शुरू किया।

डिजिटल उपवास: जरूरत और असर

डिजिटल उपवास का अर्थ है स्क्रीन से थोड़े समय के लिए दूर रहना, जो आज की ऑनलाइन जिंदगी में जरूरी हो गया है। नवरात्रि में सामान्यतः लोग मानसिक शांति और ऊर्जा के लिए व्रत रखते हैं। पर आज का युवा अक्सर सोशल मीडिया पर लगातार सक्रिय होता है, जिससे डिजिटल डिटॉक्स या उपवास की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसमें लोग सोशल मीडिया ऐप्स हटाते हैं, सुबह उठते ही फोन नहीं देखते और अनावश्यक स्क्रॉलिंग से बचते हैं।

मनोचिकित्सक डॉ. समीर मल्होत्रा बताते हैं कि शॉर्ट फॉर्म रील्स बार-बार देखने से मस्तिष्क में डोपामाइन के छोटे-छोटे स्पाइक्स उत्पन्न होते हैं। इससे मस्तिष्क का रिवार्ड सिस्टम लगातार सक्रिय रहता है, जो व्यक्ति को बार-बार स्क्रीन देखने के लिए प्रेरित करता है। यह ध्यान अवधि, स्मृति और सहनशीलता पर असर डाल सकता है। डिजिटल उपवास से मस्तिष्क को इस अत्यधिक उत्तेजना से आराम मिलता है और लंबे समय तक ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है।

सोशल मीडिया से दूरी से बेहतर मानसिक स्वास्थ्य

एक नवंबर 2025 में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, अमेरिकी युवाओं ने एक सप्ताह तक सोशल मीडिया से दूरी बनाकर डिप्रेशन में 24.8%, चिंता में 16.1% और अनिद्रा में 14.5% तक कमी देखी। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल और बेथ इजराइल डीकोनेस मेडिकल सेंटर के यह शोध डिजिटल उपवास के मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी प्रभाव दर्शाते हैं।

शुभम के उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि इस दौरान उसे पहले फोन देखने की इच्छा हुई, जिसे FOMO (Fear of Missing Out) कहते हैं। लेकिन अब वह खुद को बेहतर, शांत और कम तनावग्रस्त महसूस करता है।

डिजिटल उपवास के सरल उपाय

  • नो-रील मॉर्निंग: सुबह उठने के बाद पहला घंटा फोन न देखें।
  • एक घंटे की सीमा: सोशल मीडिया पर दिन में केवल एक घंटा बिताएं।
  • बेडरूम नो-फोन जोन: सोने से 30-60 मिनट पहले फोन को दूर रखें।

रात को फोन का स्क्रीन देखना नींद को प्रभावित करता है, क्योंकि फोन की नीली रोशनी मेलाटोनिन उत्पादन को रोकती है, जिससे नींद में बाधा होती है। फोन को सोने से पहले दूर रखना बायोलॉजिकल क्लॉक सुधारता है और ताजी नींद लाने में मदद करता है।

डिजिटल उपवास के बाद स्वस्थ आदतें

डॉ. मल्होत्रा के अनुसार, अचानक डिजिटल डिटॉक्स से शुरुआती दिनों में बेचैनी या FOMO हो सकता है। इस स्थिति में इसे स्वीकार करना, परिवार के साथ समय बिताना और योग, प्राणायाम या प्रकृति में समय निकालना लाभकारी होता है। निरंतर गैर-जरूरी नोटिफिकेशन बंद रखें और स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण बनाए रखें। यदि फोन उपयोग पर नियंत्रण मुश्किल हो तो मनोचिकित्सक से सलाह लेना जरूरी है।

नवरात्रि में नौ दिन का डिजिटल उपवास न केवल स्क्रीन से दूरी बनाने का अवसर है, बल्कि सोच-समझकर मोबाइल का उपयोग करने की आदत विकसित करने का भी मौका प्रदान करता है। इसका उद्देश्य फोन को पूरी तरह से छोड़ना नहीं, बल्कि संतुलित और नियंत्रित उपयोग सुनिश्चित करना है।

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