धर्म

दशहरा 2026: देश के कई हिस्सों में जश्न, कुछ जगहों पर क्यों रहता है मातम?

दशहरा भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जो हर साल भगवान श्रीराम द्वारा रावण के वध और बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाया जाता है। साल 2026 में यह पर्व 20 अक्टूबर, मंगलवार को मनाया जाएगा। इस दिन देश के कई इलाकों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले जलाए जाते हैं, लेकिन कुछ विशेष स्थानों पर दशहरे की इस परंपरा में असामान्य तौर पर भिन्नता देखी जाती है।

दशहरे पर रावण दहन से जुड़ी अनोखी मान्यताएं

भारत की सांस्कृतिक विविधता के चलते कुछ स्थानों पर रावण को अलग नजरिए से देखा जाता है। बिसरख, जो उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर जिले में है, यहाँ रावण को केवल एक दुष्ट राजा के रूप में नहीं बल्कि अपने पूर्वज और गांव का बेटा माना जाता है। इसलिए, इस गांव में दशहरे के मौके पर रावण का पुतला जलाने की परंपरा नहीं है।

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित बैजनाथ एक धार्मिक स्थल है जहां रावण को भगवान शिव का बड़ा भक्त माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि रावण ने यहां भगवान शिव की कृपा पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसलिए बैजनाथ में दशहरे पर रावण दहन की जगह उनकी पूजा या सम्मान की परंपरा प्रचलित है।

अन्य महत्वपूर्ण स्थान और रावण की विशेष स्थिति

मध्य प्रदेश के मंदसौर को रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका माना जाता है। स्थानीय लोग रावण को यहाँ अपना दामाद मानते हैं, जिससे दशहरे के दिन यहां रावण दहन की बजाय उनके वध पर शोक व्यक्त किया जाता है और कुछ स्थानों पर उनकी पूजा भी की जाती है।

राजस्थान के जोधपुर और उसके आसपास के मंडोर क्षेत्र में भी रावण को लेकर अलग रीति-रिवाज हैं। नागर ब्राह्मण समुदाय के कुछ लोग खुद को रावण के वंशज मानते हैं और दशहरे पर उनकी पूजा करते हैं।

महाराष्ट्र के अमरावती और गढ़चिरौली जैसे इलाकों में आदिवासी समुदायों की रावण और उनके पुत्र मेघनाथ के प्रति विशेष श्रद्धा पाई जाती है। गोंड और कोरकू जैसे जनजातीय समुदाय रावण को अपने पूर्वज और देवता के रूप में देखते हैं। इस कारण यहाँ भी दशहरे के दिन रावण का पुतला जलाने की परंपरा नहीं अपनाई जाती।

इस तरह, भारत की विविध सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं के कारण दशहरे के पर्व को लेकर दृष्टिकोण में भिन्नता पाई जाती है। जबकि अधिकांश जगहों पर यह पर्व रावण दहन के रूप में मनाया जाता है, कुछ खास स्थानों में रावण की पूजा, सम्मान या शोक मनाने की परंपरा मौजूद है।

दशहरे का यह त्योहार अच्छाई की जीत का प्रतीक है, लेकिन रावण को लेकर विभिन्न समुदायों की मान्यताएं इस त्योहार को और भी रोचक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाती हैं। इन मान्यताओं को समझना भारतीय संस्कृति की विविधता को गहराई से देखना है।

इस प्रकार दशहरे के दिन भारत के विभिन्न हिस्सों में जश्न के साथ-साथ रावण को लेकर अलग-अलग भावनाएँ और परंपराएँ देखने को मिलती हैं, जो देश की सांस्कृतिक बहुलता को उजागर करती हैं। यह त्योहार न सिर्फ भारतीय समाज की धार्मिकता बल्कि उसकी सामाजिक विविधता का भी प्रतिबिंब है।

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